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वैसे तो प्रारम्भ से ही आदीवासी बहुल समुदाय रहे अलीराजपुर क्षेत्र पर आदिवासी
राजाओं का राज्य रहा परंतु 15 सताब्दी में जोधपुर के राणा राठोर नरेश के वंशज
आनंददेव ने उस समय जमुरा डोडीया भील तथा उसकी फोज को मार कर उसके कब्जे के सारे
इलाके को अपने अधिकारी में कर लिया जिसकी हदे उत्तर दिशा की ओर झाबुआ-दाहोद के
तालाब तक ओर पश्चिम में शिवराजपुर गुजरात तक दक्षिण में नर्मदा नदी तक तथा पूर्व
में हथनि नदी के किनारे धोलगढ तक थी। आनंद देव को शिकारी खेलने का बहुत शोक था ।
एक दिन आनंददेव शिकार खेलते खेलते आली के जगल की तरफ चले गये जहाॅं उस समय अलिया
भील का राज्य था। इसी जगह राजा को एक खरगोश दिखाई पड़ा उसके पिछे मुडकर आनंददेव की
घुरकर देखा ओर नजरो के सामने से गायब हो गया । तब राजा आनंद देव ने महसुस किया कि
यह कोई चमत्कारी स्थान होना चाहिए जो खुशनुमा ओर बहुत रोनक वाली जगह है। उसी समय
राजा आनंददेव ने इस स्थान पर एक किला सन् 1438 ई0 में माघ सुदी पंचमी शनिवार के
दिन बसाया । वह उसका नाम आनंदावली रखा , पचाश्त अलिया भील युध्द मे मारा गया तथा
आनंद देव का एक छत्र राज्य स्थापित हो गया । इसके बाद राजा आनंद देव ने अपनी
राज्यधानी मोटीपोल से आली स्थानातरित कर दी तथा इसका आनंदावली रखा । राजा आनंददेव
ने अपने छोटे भाई इन्द्रदेव को सन् 1440 में फुलमाल नामक गाॅंव जागीर में दिया और
उसे अपना प्रधानमंत्री बनाया । इसके बाद राजा ने अपने अमीर उमराव तथा भाई बन्दुओ
को अपने अधिन क्षेत्र के परगनो का बटवारा कर दिया जिसके अनुसार वजेसिंह को आमखुट
परगना , मानसिंह सोलंकी को डही परगना , भुलजी को झिरण परगना , अधिकरणदेव जी को
मथवाड़ परगना , तथा सारगदेव जाधव को कट्ठीवाड़ा दे दिया । ये पाॅंचो उमराव कई सालो
तक आनंदावली राज्य के अधिन रहे। परंतु धीरे-धीरे डही , मथवाड़ और कट्ठीवाड़ा परगने
अलग हो गये। परंतु झिरण व आमखुट की वंश न चलने से दोनो ही आनंदावली के अधीन रहे।
राजा आनंददेव के बाद उसका पुत्र चचलदेव गददी पर बैठा । उसके दो पुत्र हुए ,
गुगलदेव व केशरदेव अपने पिता चचलदेव की हत्या पर गुगलदेव सन् 1470 में यहाॅं का
राजा बन गया । उधर छोटे भाई केशरदेव ने अपने पिता के जीवित रहते ही सन् 1465 में
राज्य के उत्तर पूर्व में जोबट पर अपना कब्जा कर लिया था। उधर आली के राजा गुगलदेव
का पुत्र कृष्णादेव निःसंतान मरा तक कृष्णादेव का भतीजा बंच्छराज राजसिहासन पर
बैठा बंच्छराज के चार पुत्र थे । पहला पुत्र दिपसेन था इसने अपने भाई संबलसिंह को
07 मई 1665 को सोण्डवा गाव की अलग से जागीर दे दी थी। दिपसेन का पुत्र सुरतसिंह
हुआ जिसने आली राज्य का बहुत विस्तार किया सुरतदेव के 4 पुत्र हुए पहला पहाडदेव
दुसरा प्रतापदेव (प्रतापसिंह प्रथम) तीसरा दौलसिंह व चैथा पुत्र अभयदेव थे। इनमे
से सुरतदेव की मृत्यू के पश्चात बडा पुत्र पहाडसिह राजगददी पर बैठा इस परिस्थिति
ने प्रतापसिंह प्रथम ने भाई के पास रहना उचित नही समझा ओर महेश्वर चला गया । तथा
अपनी पहचान छुपाकर 5 साल तक अहिल्याबाई होलकर के पास रहे जब अहिल्याबाई को यह पता
चला कि प्रातापसिंह (प्रथम) आली के राजा का भाई है तो उन्हे अपना मुहबोला भाई
बनाया व वापस उन्हे आली भेज दिया । आली वापसी होने पर प्रतापसिंह प्रथम सत्ता
प्राप्त करने की योजना बनाकर लगातार कार्य किया अन्नतः दिनांक 29 जूलाई सन् 1765
को प्रतापसिंह प्रथम ने अपने आप को आली राज्य का राजा घोषित कर दिया । राजा
प्रतापसिंह का विवाह गुजरात के धरमपुरी राज्य की सिसोदिया राजकुमारी से हुआ । राज
प्रातापसिंह ने अपने सगे भाई दोलतसिंह को सन् 1777 में भाभरा रियासत प्रदान की उधर
मथवाड़ भी एक प्रथक रियासत होकर यहाॅं ठाकुर रामसिंह शासक थे। सन् 1797 ई0 में
मुसाफिर मकरानी वास्तविक नाम दुरमोहम्मद खान अपने साथीगण बेतुला मकरानी ओर हासम
मकरानी अफगानिस्तान की सीमा से लगे मकरान प्रांत से आकर आली राज्य के सेवक नियुक्त
हुए । श्री मुसाफिर मकरानी आजीवन राज्य के बहुत ही वफादार सेवक रहे। ओर कई मरतबा
उन्होने राज्य की आक्रमणों , हमलो आदि से रक्षा भी की इस के बाद प्रतापसिंह प्रथम
का शासन छोटे मोटे विवादो व आपसी आक्रमणो के बावजुद चलता रहा इसके बाद सन् 1800 मे
चेत्र वदी अष्ठमी शनिवार को आली रीयासत की राजधानी आली से राजपुर स्थांतरित कर दि
गई । महाराज प्रताप सिह पृथम की मृत्यु के पश्चात महारानी प्रतापकुॅवर बाई के गृभ
से सन 1809 में जसन्त सिंह का जन्म हुआ। पश्चात महाराज जसवंत सिह का शासन चला व सन
1861 में उनकी मृत्यु हो गई । जसवंत सिह की मृत्यु के पश्चात इनके पुत्र गंगदेव
राजगद्दी पर बैठे तथा सन 1862 से 1871 तक अलीराजपुर में राज्य किया इनकी मृत्यु
पश्चात इनके भाई रूप देव ने 1871 से 1881 तक राज्य किया ओर वे भी एक वर्ष पश्चात
मृत्यु को प्राप्त हुवे। रूप देवजी की कोई संतान न होने से सोण्डवा ठाकुर परिवार
के कालुबाबा को पोत्र व चंद्रसिह के पुत्र विजय सिह को अलीराजपुर लाकर राजगद्दी पर
बैठाया इनहोने सन 1890 तक अलीराजपुर राज्य पर राज कीया और इनकी भी कोई संतान न
होने से पुनः सोण्डवा के कालुबाबा के पोत्र व दुसरे पुत्र भगवान सिह के पुत्र
प्रतापसिह द्वितीय को सोण्डवा से लाकर विधि विधान से राजतीलक कर अलीराजपुर
राजगद्दी पर बैठाया । हिजहाईनेस प्रताप सिह द्वितीय का जन्म 12 सिंतबर सन 1881 मंे
हुआ व उनका राजतीलक 10 जुन सन 1891 में किया गया महाराजा प्रताप सिह द्वितीय की
शिक्षा राजकोट के राजकुमार कालेज मे हुई । युवा हेाने पर सन 1901 में उन्हे
अलीराजपुर राज्य के नानपुर व खट्टाली के परगनो के शासन का भार सौपा गया तथा एक साल
बाद ही उन्हे पृथम श्रेणी मजिस्टेट के अधिकार प्रदान किये गये। दिनांक 27 जनवरी सन
1904 मंे महाराजा श्री प्रताप सिह को शाासन संचालन के समस्त अधिकार प्रदान किये
गये । 04 मार्च 1908 को महाराजा प्रतापसिह का विवाह कट्ठीवाडा के ठाकुर श्री
बहादुरसिंह जादव की सुपूत्री श्रीमति रानी राजकुॅवर बाई के साथ सम्पन्न हुआ ।
महाराजा प्रतापसिंह की बडी रानी के गर्भ से संवत 1961 की श्रावण सुदी ग्यारस केा
प्रिंस फतेह सिह जी का जन्म हुआ । महाराज फतेह सिह जी की शिक्षा डेली कालेज इन्दौर
व राजकुमार कालेज राजकोट से हुई । प्रिंस फतेह सिह जी को इतीहास , साहित्य , शिकार
, पौलो व क्रिकेट खलने का बडा शौक था। महाराजा प्रतापसिह जी ने अलीराजपुर नगर मे
इसी समय मे बडे व सुन्दर खैल मैदान वर्तमान मे कलेक्टर कार्यालय के सामने स्थित
फतेह क्लब मैदान , गेस्ट हाउस , प्रताप भवन , हास्पीटल तथा स्कुल बनवाए , ओर नगर
नियोजन की सुन्दर रचना की। प्रिंस फतेहसिह जी का विवाह खिची कुल के हिज हाईनेस
महाराज सर रणजीतसिहं जी के स्टेट के बारिया नरेश जी की राजकुमारी सो राजकुमारी
राजेतुकुवंरबाई के साथ दिनांक 07 मई सन 1922 में धुमधाम से हुआ । प्रिन्स फतेहसिंह
जी की 6 संताने हुई इनमें 3 राजकुमार व 3 राजकुमारी थी। इनमे महाराज सुरेन्द्रजी
का जन्म 17 मार्च सन 1923 को हुआ तथा महाराज कमलेन्द्रसिंह अभी जीवित है।
राजकुमारीयों की शादीयाॅं कर दी गई थी। राजाप्रतापसिंह द्वितीय बहुत सदिप ,
परोपकारी व अंग्रेजी हुकुमत के खास थे। 03 जून 1915 को दिल्ली सम्राट ने अपने जन्म
दिवस पर प्रतापसिंह जी बहादुर के0सी0आई की उच्च उपाधि प्रदान कर सम्मानित किया सन
1917 में राजा साहब ने सेंट जान्स एम्बुलेंस एसोशिएसन की आर्थिक सहायता की इस
सहायता व वफादारी से प्रसन्न होकर दिनांक 01 जनवरी 1920 को राजा साहब की सलामी 9
तोपो से बडाकर 11 तोप की सलामी कर दी गई। साथ ही एक वर्ष बाद दिनांक 01 जनवरी 1921
को अग्रेज सरकारी द्वारा पुस्त-दर-पुस्त के लिए हिज हाईनेस उपाधि स्थाई करते हुए
महाराजा प्रतापसिंह द्वितीय सम्मानित भी किया । इस समय अलीराजपुर की आबादी 5000
हजार से कुछ अधिक थी । यहाॅं के रास्ते व बाजारा चैडे़ तथा सीधे हवादार होकर
सुन्दर मकानों से युक्त मनभावन नगर था। हिज हाईनेस श्री प्रतापसिंह बड़े ही निर्भीक
व दयालु शासक थे बावजूद जो डाकु व चोर लुटेरे दिन दहाडे डाका डालते उन्हेें कठोर
दण्ड दिया जाता था। अलीराजपुर रियासत की जनसंख्या 12 हजार थी जिसमें 569 ईसाई धर्म
के अंग्रेज, पादरी लोग थे। अधिकतर ईसाई भील जाति से कन्वर्टेड थे ये लोग आमखंुट,
अलीराजपुर सर्दी, मंेढा आदि जगह स्थापित थे। धर्म प्रचारक पादरियों के पास खेती
बाड़ी के लिए राज्य द्वारा दी गई बहुत सी भूमि थी। दिनांक 1 फरवरी 1924 में
अंग्रेजो के नियमानुसार स्टेट फोर्सेस (फोज) की स्थापना की गई थी जो प्रताप
इन्फेन्ट्री कहलाती थी। इसमे गोरखे व सैनिक बेंड भी थे। हिज हाईनेस महाराज श्री
प्रतापसिंह जी के शासन काल में खेलो के विकास पर बहुत ध्यान दिया गया। अलीराजपुर
नगर में क्रिकेट का विशाल मैदान (वर्तमान में फतेह क्लब मैदान), पोलो खेल के लिए
विषाल मैदान के साथ ही बेडमेन्टन के लिए लकडी की उच्च किस्म से तैयार किया गया
बेडमिंटन हाल (वर्तमान मे भी अस्तित्व में) पूरे देश मे प्रसिध्द थे। तत्कालिन समय
में विजयनगर के महाराजा राजकुमार अपनी रियासत के खर्चे से टीम तैयार करते थे।
बहुधा इस टीम में अलीराजपुर रियासत के 5-6 खिलाड़ी रहते थे। जिनमें महाराज कुमार
श्री फतेसिहजी, श्री शाहबुदीन मकरानी, श्री सईदुदीन मकरानी आदि थे। इस प्रकार
तत्कालिन विजयनगर अलीराजपुर तथा पटियाला रियासत ने क्रिकेट खेल को आगे बढ़ाने व देश
में प्रसार करने में मिल के पत्थर का कार्य किया । इस प्रकार महाराजा प्रतापसिंह
जी द्वितीय ने सन 1948 (आजादी तक ) अर्थात 57 वर्षांे तक तक अलीराजपुर रियासत पर
सफलतापूर्वक शासन दिया उनके निधन के पष्चात् उनके पोत्र व महाराजा फतेसिंहजी के
पुत्र श्री सुरेन्द्रसिंह जी महाराज साहब का राजतिलक हुआ। उसके बाद आलीराजपुर
राज्य का भारतीय संघ में विलय हो गया लेकिन हिज हाईनेस श्री सुरेन्द्रसिंह जी
हमेशा बापजी के नाम से लोकप्रिय रहें व वे पत्रों पर पद हस्ताक्षर भी इसी नाम से
करते थे। वैसे महाराजा सुरेन्द्रसिंह जी एक अत्यधिक शिक्षित व्यक्ति होकर उन्होने
आई0सी0एस0 की परीक्षा भी उत्तीर्ण की थी। वे भारतीय विदेश सेवा में अनेकों देषों
में भारतीय राजदूत के रूप में अपनी सेवाएॅं दे चुकंे। देष के पूर्व प्रधानमंत्री
श्री जवाहरलाल नेहरू व श्रीमति इंदिरा गाँधी से उनके पारिवारिक संबंध रहें।
सेवानिवृति के बाद भी महाराजा सुरेन्द्रसिंहजी काफी सक्रियता पूर्वक सेवा कार्यों
में लगे रहें। महाराजा सुरेन्द्रसिंहजी एक उदारवादी एवं एक आतिथ्य प्रिय शक्स थे।
सन् 1947 में देष की आजादी के बाद 1948 में आलीराजपुर रियासत के भारतीय संघ में
विलय हो जाने के बाद यह क्षेत्र प्रषासनिक रूप से मध्य भारत के अधीन हो गया।
नवीन मध्यप्रदेश के निर्माण पश्चात्ः- वर्तमान मध्यप्रदेश के
निर्माण 01 नवम्बर 1956 के बाद आलीराजपुर झाबुआ जिले के अन्तर्गत आ गया, वैसे तो
आलीराजपुर को जिला बनाने की दावेदारी उस समय भी थी, परन्तु झाबुआ एक तरफ पेटलावद व
थांदला तहसीलों के मध्य मे था, तो दूसरी तरफ जोबट व आलीराजुपर तहसीलों के मध्य
होने से झाबुआ को जिला मुख्यालय का दर्जा प्रदान किया गया। तब से लेकर आलीराजपुर
जो खुद एक बड़ी तहसील होकर अनुविभागीय मुख्यालय था जिसके अधीन तीन बड़े विकास खण्ड
क्रमषः आलीराजपुर, सोण्डवा व कट्ठीवाड़ा रहें, जिनमें सोण्डवा व कट्ठीवाड़ा टप्पा
तहसील के रूप में कार्यरत् रहीं। इसी के साथ आलीराजुपर को जिला बनाने के लिए सुदूर
नर्मदा नदी से जुड़े ग्रामों बखतगढ़, मथवाड़, ककराना, इत्यादि से लगातार मांग होती
रहीं। जनप्रतिनिधि आम जनता राजनैतिक दल भी समय-समय पर आलीराजपुर को जिला बनाने की
मांग करते रहें हैं। सन् 2003 के विधानसभा के चुनाव में उमा भारती ने आलीराजपुर को
जिला बनाने का वादा किया ओर फिर तो यह मांग जोर पकड़ती गई। क्षेत्रीय जन संगठन भी
जागे ओर जन दबाव के चलते मुख्यमंत्री श्री षिवराजसिंह चोहान ने दिनाँक 17 मई सन्
2008 को आलीराजपुर को जिला बनाने की घोषणा की। इस प्रकार से मुख्यमंत्री श्री
षिवराजसिंह चैहान ने एक बेहतर प्रषासनिक व्यवस्था की नींव रखीं।
नवीन गठित अलीराजपुर जिले की प्रशासनिक व्यवस्था का ताना-बानाः-
दिनाँक 17 मई सन् 2008 को नवगठित इस अलीराजपुर जिले की प्रषासनिक व्यवस्था कुछ इस
तरह से हैंः- जिला मुख्यालय (कलेक्टोरेट) अलीराजपुर नगर में स्थित हैं, अनुविभागीय
मुख्यालय (राजस्व) 02 हैं- पहला- अलीराजपुर एवं दूसरा जोबट। तहसीलें 03 हैंः-
अलीराजपुर, जोबट व भाबरा साथ ही विकासखण्ड की संख्या 06 हैं। एकीकृत आदिवासी विकास
परियोजना भी यहाँ संचालित हैं व इसका मुख्यालय भी अलीराजपुर में हैं। इसके अधीन 06
विकासखण्ड क्रमषः अलीराजपुर, जोबट, सोण्डवा, कट्ठीवाड़ा, भाबरा व उदयगढ़ हैै। जिले
मेें वर्तमान में 03 टप्पा तहसीलें क्रमषः सोण्डवा, कट्ठीवाड़ा व उदयगढ़ हैं। यहाँ
जिला पुलिस अधीक्षक का कार्यालय व दो अनुविभागीय पुलिस अधिकारियों के कार्यालय
क्रमषः अलीराजपुर व जोबट में हैं।
अलीराजपुर जिले की आदिवासी संस्कृति एवं लोक कलाएँ:-
आदिवासी अर्थात् आदि समय से यानि प्रारंभिक काल से जो लोग यहाँ निवास कर रहें वे
ही आदिवासी कहलाते हैं, मतलब मानव के धरती पर जीवन के अस्तित्व के समय से लेकर आज
पर्यन्त जो लोग चिरकाल से निवासरत् हैं, वे ही आदिवासी हैं। अब जहाँ तक इन लोगों
की संस्कृति का प्रष्न हैं यह बहुत व्यापक व विस्तृत क्षेत्र हैं क्योंकि संस्कृति
शब्द समाहित करता हैं, किसी भी समूदाय विषेष के संस्कारों, आदतों, रीति-रिवाजों,
रस्मों, त्यौहारों, रहन-सहन, खान-पान, पहनावा, जीवन शैली आदि को शामिल किया जाता
हैं। हमारे अलीराजपुर जिले में आदिवासी समूदाय मूख्यरूप से तीन वर्गों में विभाजित
हैं- 1. भील, 2. भीलाला, 3. पटलिया इनमेें कमोबेष भीलाला व पटलिया समूदाय के लोग
अधिक उन्नत षिक्षित व साधन सम्पन्न होकर विकसित हैं, वहीं भील समूदाय के लोग अभी
भी पिछड़े हुएँ हैं, इसके अनेक कारण हैं, परन्तु आदिवासी अपनी अलग ही पहचान रखते
हैं। आम आदिवासी बहुत अधिक श्रमषील, अभिमानी स्पष्टवादि व भोले-भाले होते हैं।
खेती व मेहनत मजदूरी कर अपने लालन-पालन करते हैं। आमतोर पर आदिवासी बनावटी नहीं
होते हैं, वे जो बहार होते हैं, वैसे ही अन्दर होते हैं। वैसे आदिवासी संयुक्त
परिवारोें में ही विष्वास करते हैं व संयुक्त रूप में ही रहते हैं, जहाँ एक-एक घर
में 20 से 25 व्यक्ति तक आसानी से निवास करते है। आदिवासियों का जीवन बहुत सरल व
सहज होता हैं, इनकी आवष्यकताएँ भी सीमित हैं। इनके घर फलियों में होते हैं, फलिया
जिसे मोहल्ला भी नाम दिया जा सकता हैं, जो ग्राम की महत्वपूर्ण ईकाई होता हैं, ऐसे
कई फलियों से मिलकर एक ग्राम होता हैं, ये फलिये पाँच किलोमीटर की दूरी में भी हो
सकते हैं ओर ऐसे सभी फलियों में औसतन 25 से 50 घर हो सकते हैं आमतोर पर किसी भी
ग्राम में 10 फलिये तो होते ही हैं परन्तु कहीं-कहीं पर इसका विस्तार 20 फलियों तक
हो जाता हैं। सामान्यतः आदिवासियों के घर कच्चे बाँस-बल्लियों व मिट्टी के ही बने
होते हैं, परन्तु अब आधुनिकता के चलते तथा शासकीय योजनाओं से आई आर्थिक समृद्वता
से अब गाँवों में आर.सी.सी.के. पक्के मकान व हवेलियाँ भी अब तेजी से बन रहीं हैं।
आदिवासियों के मुख्य त्यौहार भगोरिया, इन्द, चोदस, गलबाबजी, गाता स्थापना, दिवासा,
फसल कटाई पर नवाई त्योहार, बाबादेव का पुजन, पाटला पुजन आदि होते हैं। वैसे ये लोग
प्रमुख हिन्दू त्योहार होली, दिवाली, रक्षाबन्धन आदि भी बहुत उल्लास से मनाते हैं।
रंगगुलाल होली भी खुब खेलते हैं, दिपावली पर पटाखें भी खुब फोड़ते हैं। आदिवासियों
में विवाह युवक-युवतिंयों के आपसी रजामंदी के आधार पर जाति समाज पंचायतों द्वारा
तय किये जाते हैं, जिसमें वर पक्ष को वधू के परिवार जनों को वधू मूल्य देना आवष्यक
होता हैं, यह स्थापित रिवाज़ हैं, जिसे दापा भी कहा जाता हैं, इसमें 1000 रूपये से
लेकर 50000 रूपये नगद, चांदी के गहनें, बकरे, अनाज शामिल होते हैं, इसे देने के
बाद ही विवाह सम्पन्न होता हैं। किसी भी व्यक्तिगत व पारिवारिक आयोजन में बकरा
मारना अनिवार्य होता हैं, साथ ही रातभर खुब नाचना-गाना भी होता है तथा आग्रह
पूर्वक पीने-पीलाने का दोर भी चलता हैं। आदिवासी लोग अच्छे मेहमान नवाज़ भी होते
हैं वहीं सुख-दूःख में भी परस्पर सहयोगी होते हैं। किसी व्यक्ति की मृत्यु पर
अंत्येष्टि कार्यक्रम पर दूर-दराज ग्रामों से लोग लकड़े देने आते हैं व शोक सन्तप्त
परिवार को अपनी सांत्वना प्रदान करते हैं। आदिवासी लोग जन्म-जात कलाकार होते हैं।
अपने रहने के मकान से लेकर खेत-खलिहान तक का सारा कार्य, अपने जीवन उपयोग के खाट,
पंलग, कोठियां आदि खुद ही बना लेते हैं फिर भी आदिवासी लोगों में कुछ कलाएँ खास
हैं, जो लोक कलाओं के रूप में ख्यात हैं, जिनमें महत्पूर्व हैं- पिथौरा (पिठोरा)
कला, बाँस कला, उन से निर्मित वस्तुओं की कला, काष्ठ कला, माटी कला आदि इनमें
पिथौरा कला महत्पूर्ण हैं, जिसमें आदिवासी लोग अपने घरों पर भित्ति चित्रों को
उकेरते हैं, जिनमें जंगली जानवरों देवी-देवताओं आदि के चित्र होते हैं, इसके पीछे
मंषा यही होती हैं कि ईष्वर हमारी रक्षा करें व हमें सम्पन्न्ता प्रदान करें। बाँस
कला में बहुत ही कलात्मक वस्तुएँ, बांसुरी, डलियां, टोकनी, झाडू, पर्स इत्यादि
बहुत सी वस्तुएँ बनाई इनके द्वारा बनाई जाती हैं। इसके साथ ही उन से निर्मित
वस्तुओं से भी महत्पूर्ण चीजें तैयार की जाती हैं, इनमें कमर का घंुघरू वाला लटकता
कन्दौरा, सिर की चैमोल, सिर पर महिलाओं द्वारा बांधी जाने वाली डोरी, नाचने का
वागरा आदि बहुत सी चीजें बनाई जाती हैं। इसी प्रकार लकड़ी व मिट्टी से भी बहुत
कलाल्मक वस्तुएँ व मूर्तियाँ आदि भी आदिवासियाँ द्वारा बेहतर ढं़ग से बनाई जाती
हैं। आदिवासियों द्वारा अपने जीवन यापन की वस्तुएँ साप्ताहिक रूप में हाट बाजारों
में खरीदी जाती हैं। आदिवासी समाज में प्रत्येक वर्ग की अपनी जाति पंचायत होती
हैं, लग-भग प्रत्येक ग्राम में यह होती हैं। ग्राम का पटेल, तड़वी, पुजारा आदि का
मुख्य रोल होता हैं, जो आपसी जगड़ों, विवादों व षिकायतों का निराकरण करतें हैं,
इनका निर्णय प्रायः मान्य ही होता हैं। वैसे आदिवासी संस्कृति व कला को अक्षुण्ण
रखने के लिए सरकार को विषेष प्रयास करना चाहिए कारण बदलते हुए आधुनिकता के दोर व
आदिवासियों में षिक्षा के जमकर प्रचार-प्रसार व लाभान्विती के चलते अब पारंपरिक
लोक कलाएँ विलुप्त सी होती जा रहीं हैं। आज आदिवासी वर्ग काफी सम्पन्न होता चला
हैं। प्रायः गाँवों में चार पहिया वाहन (जीप-कार) एवं टैªक्टर तो आम बात हो चली
हैं। बीते दषकों से सतत् विभिन्न शासकीय आर्थिक योजनाओं के दरिये आदिवासियों में
काफी तेजी से आर्थिक सम्पन्नता आती जा रहीं हैं ओर अब ये अपने पारंपरिक खेती के
धंधें के अलावा भी अन्य कई तरह के व्यवसायिक कार्य भी करने लगे हैं। आदिवासियों बस
एक कमी खलती हैं वह है उनके स्वभाव की उग्रता किसी भी छोटी सी बात पर तेजी से
आवेषित होकर क्रोध में बड़े से बड़ा जघन्य अपराध, हत्या आदि भी करना आम बात हैं, ये
बहुत बड़ी कमी हैं जिसे समाज के प्रबुद्व लोगों को आगे आकर अपने समूदाय के लोगों को
सतत् समझाईष देकर इन उग्र स्वभावगत आदतों को त्यागने के लिए तैयार करना होगा
अन्यथा जिले का जो इस समूदाय का आपसी आपराधिक इतिहास व रेकार्ड हैं वह यूँ ही जारी
रहेगा। उसके लिए शासकीय प्रयास नाकाफी हैं।
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