|
अलीराजपुर जिले में पर्यटन स्थल व संभावनां :- सुरम्य वादीयाॅं
, घने वन , अमराईयों के कुंज , पलास क चटख रंगो की लालिमा , महुॅओं के पेड के
फुलों की गरमाती खुशबू , कल कल करते पहाड़ी झरनों का अल्हड़पन ये सभी बरबज ही आपका
मन मोह लेगी अलीराजपुर जिले की प्राकृतिक संरचानाएं। आदीवासीयों की मस्तमोला
जीवनशैली को करीब से जज करना ही किसी बडे पर्यटन स्थल कि सैर से कम नही है ओर फिर
सेलानियो के लिए अलीराजपुर जिले में भ्रमण दर्शन के लिए काफी कुछ है। जिनमे एक छोर
कट्ठीवाड़ा (मिनी कश्मीर के नाम से विख्यात) के जंगल व दर्शनिय स्थानों से होकर
दुसरे छोर में स्थित सोण्डवा विकासखण्ड के मथवाड़ क्षेंत्र की सुन्दर घुमावदार
हरिभरी पहाडीयाॅं और साथ ही जोर -शोर से प्रवाहित होती नर्मदा नदी का दर्शन उसमें
मोट व बोट की सवारी का अपना अलग ही आनंद है , और इन सब क साथ ही अलीराजपुर के समीप
मालवई माताजी का प्राचीन मंदिर जैनतीर्थ स्थल लक्ष्मणी का सौदर्य ऐसे ही कई
ऐतिहासिक व पूराताविक महत्व के स्थानों को आप पाऐगे अलीराजपुर जिले के आगमन पर ।
तो आईये पर्यटन के विकास की अपार संभावनाओ से भरे अलीराजपुर जिले में जहाॅं बिखरा
है प्रकृति का शारवत किन्तु सहज सौदर्य साथ ही भोले भाले आदीवासीयों की रंगारग व
आश्चर्य जनक जीवनशैली का ताना-बाना।
कैसे पहुॅंचे:- अलीराजपुर खण्डवा-बडौदा राज्यमार्ग क्रमांक 26
पर बड़ोदा से 150 किलोमीटर , धार जिले के कुक्षी से 48 किलोमीटर , झाबुआ जिला
मुख्यालय से 85 किलोमीटर की दुर स्थित है। समस्त मार्गो से यहाॅं तक पहुचने के लिए
पक्की सड़क है। साथ ही इन्दौर से भी यह 250 किलोमीटर दुर स्थित होकर अनेको सीधी
बसों का यहाॅं आवागमन होता है।
सैर का समय वैसे तो वर्षा भर परन्तु कट्ठीवाड़ा के लिए विशेष
जूलाई से लेकर नवम्बर तक , भगोरिया दर्शन हेतु माह मार्च मे होली से 1 सप्ताह
पूर्व कभी भी।
ठहरने के स्थान:- जिला मुख्यालय पर लोक निर्माण विभाग का
विश्राम गृह , वन विभाग का डाक बंगला तथा अनेक निजी होटले आदी । वैसे मध्यप्रदेश
पर्यटन विकास निगम द्वारा एक मोटल/होेटेल बनाये जाना क्षेत्र के विकास के लिए
अनिवार्य है। साथ ही पहाड़ी टेªनिंग को बडावा देने हेतु भी पर्यटन विभाग द्वारा
प्रयास किये जा सकते है।
मथवाड़ क्षेत्र:- अलीराजपुर जिलें के सुदुर दक्षिण में विन्ध्य
पर्वत श्रैणियों से घिरा मथवाड़ क्षेत्र जो न केवल काफी उचाई पर स्थित है वरन अपनी
अलग ढलानों पहाड़ी धंरा , पहाड़ी खेती व प्रकृति से संघर्ष कर जीवन यापन करते
वनवासियों का दर्शन यहाॅं होता है। यहाॅं बोध होता है। कैसे प्रकृति की दी
चुनौतियों के साथ जस्य बिढाकर व्यक्ति अपने जीवन को गति देता है। 66 देहाती
क्षेत्र में स्थित यहाॅं के ग्राम व ग्रामवासी काफी मुश्किलों मंे जीवन यापन करते
है। यहाॅं चाय का एक कप प्याला दुलर्भ है। वैसे मथवाड़ क्षेत्र मंे भी जगली जानवरों
की भरमार है। यहां काजलराणी का प्रसिध्द मंदिर भी है। मथवाड़ पहुचने के लिए लगभग 10
किलोमीटर की खड़ी घुमावदार चडाई होकर पुरा घाट सेक्शन है। जो रोड़ बखतगढ़ ग्राम से
मथवाड़ जाता है। मथवाड़ मे भालु , हिरन , जंगली भैसे , खरगोश शेर , तैदुआ , चीता आदी
जानवर पाये जाते है। गुजरात की सीमा से लगा होने के कारण यहाॅं भाषा भी मिक्स
गुजराती है ओर पुरूषों व महिलाओं का पहनावा भी गुजराती जैसा ही है।
|